Kaise samjhayen inhe! (hindi poem)
जिनका पेशा है दिलों से खेलना
और अनेकों को नासूर घाव देना
वो केहेते हैं की ज़िन्दगी को इस तरह अपने ऊगलियों के बीच से फ़िसलने ना दो
मुझ पर ऐत्बार कर
हालात ने जिनको सिखाये हैं कुछ चन्द पाठ
उसे केहेते हैं की नज़र अन्दाज़ कर
ज़िन्दगि के मज़े लूट
मुझ से प्यार कर
कैसे सम्झायें इन्हे कि
मासूमियत पलट कर वपस नहीं आती
लाख करो उसे तलाश
प्रत्यक्श ना पाओगे उसे
दिल तोडना आपकी फ़ितरत है
मरहम लगाना आप क्या जाने
भावनाओं से गुथी हुई माला से तप करना आप क्या जाने
बस बेहेते चले जा रहे हैं
बिन किनारे प्रवाह की तरह
कभी सोचा है कितनी सांत्वना है गम्भीर्ता में?
Copyright © BuntysBanter 2007
और अनेकों को नासूर घाव देना
वो केहेते हैं की ज़िन्दगी को इस तरह अपने ऊगलियों के बीच से फ़िसलने ना दो
मुझ पर ऐत्बार कर
हालात ने जिनको सिखाये हैं कुछ चन्द पाठ
उसे केहेते हैं की नज़र अन्दाज़ कर
ज़िन्दगि के मज़े लूट
मुझ से प्यार कर
कैसे सम्झायें इन्हे कि
मासूमियत पलट कर वपस नहीं आती
लाख करो उसे तलाश
प्रत्यक्श ना पाओगे उसे
दिल तोडना आपकी फ़ितरत है
मरहम लगाना आप क्या जाने
भावनाओं से गुथी हुई माला से तप करना आप क्या जाने
बस बेहेते चले जा रहे हैं
बिन किनारे प्रवाह की तरह
कभी सोचा है कितनी सांत्वना है गम्भीर्ता में?
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