Sunday, April 20, 2008

Kaise samjhayen inhe! (hindi poem)

जिनका पेशा है दिलों से खेलना
और अनेकों को नासूर घाव देना
वो केहेते हैं की ज़िन्दगी को इस तरह अपने ऊगलियों के बीच से फ़िसलने ना दो
मुझ पर ऐत्बार कर

हालात ने जिनको सिखाये हैं कुछ चन्द पाठ
उसे केहेते हैं की नज़र अन्दाज़ कर
ज़िन्दगि के मज़े लूट
मुझ से प्यार कर

कैसे सम्झायें इन्हे कि
मासूमियत पलट कर वपस नहीं आती
लाख करो उसे तलाश
प्रत्यक्श ना पाओगे उसे

दिल तोडना आपकी फ़ितरत है
मरहम लगाना आप क्या जाने
भावनाओं से गुथी हुई माला से तप करना आप क्या जाने
बस बेहेते चले जा रहे हैं
बिन किनारे प्रवाह की तरह
कभी सोचा है कितनी सांत्वना है गम्भीर्ता में?

Copyright © BuntysBanter 2007

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