Sunday, April 20, 2008

बहुत अजीब है यह ज़िन्दगी

बहुत अजीब है यह ज़िन्दगी
कब किस मोड पर आकर रुक जाती है बगैर
कोइ रुकावट की आगाह किये

लडखडाते...…सम्भल्ते अपने आप को समझाते
कि यह अनुभव भी हमे कुछ न कुछ तो निशचिन्त रुप सेसिखायेगाही
ह्रिदय को निचोडती है कुछ पल
जब खालिपन डट कर बैठ जाति हैशून्य को केन्द्र बानाये
मन हताश …कौन सम्झाये?

घडि के कांटो को जैसे किसि बलवानने
दाबोच लिया है अपने पूरी शक्ति से
ना छ्ठ रहे हैं उदासीनता के बादल
ना ठंडक मिल रही है ह्रिदय को सुबह कि ओस की ताज़गी से

ना उम्मीद झांक रहि है
खिलते पंखडीयों की तरह
ना बसन्त आस पास फटक रहि है जैसे की कोइ शिकवा हो

बस यही आसरा है कि
ऐसे दिनो की भी अन्त होती है
समय मरहम लगाती है
और एक दिन गेहेरी घाव भी
एक दाग बन कर रह जाती है ।

Copyright © BuntysBanter 2008

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